भारतीय शास्त्रीय संगीत में वर्ण का महत्व | Definition of Varna

वर्ण की परिभाषा :-

गानक्रियोच्यते वर्ण: स चतुर्धा निरुपित: ।

 

स्थाय्यारोहाबरोही च सचारीत्यथ लक्षणं ।।
– अभिनव रागमंजरी

अर्थात् :- गाने की जो क्रिया है, उसे “वर्ण” कहते है। वर्ण चार प्रकार के होते है जिन्हें क्रमश:
१. स्थायी २. आरोही 3. अवरोही ४. संचारी वर्ण कहते है।

१. स्थायी वर्ण :- एक ही स्वर बार- बार ठहर-ठहरकर बोलने या गाने की क्रिया को स्थायी वर्ण कहते है; जैसे : – सा सा सा सा , रे रे रे रे अथवा ग ग ग ग । स्थायी का अर्थ है – “ठहरा हुआ”।

२. आरोही वर्ण :- नीचे स्वर से ऊँचे स्वर तक चढ़ने या गाने की क्रिया को आरोही वर्ण कहते है ; जैसे:- षडज से आगे स्वर बोलने है तो “सा रे ग म प ध नि ” यह आरोही वर्ण हुआ।

३. अवरोही वर्ण :- ऊँचे स्वर से नीचे स्वरों पर आने या गाने की क्रिया को अवरोही वर्ण कहते है ; जैसे :- षडज स्वर से नीचे के स्वर बोलने है, तो “सा नि ध प म ग रे सा ” यह अवरोही वर्ण हुआ।

४. संचारी वर्ण :- स्थायी, आरोही और अवरोही – इन तीनो वर्णों के संयोग (मिलावट) से जब स्वरों की उलट- पलट की जाती है, अर्थात् जब तीनो वर्ण मिलकर अपना रूप दिखाते है, तब इस क्रिया को संचारी वर्ण कहते है।

निष्कर्ष :- गाते – बजाते समय उपर्युक्त चारो वर्ण काम में लाये जाते है। किसी भी गायन में उपर्युक्त चारो वर्ण अवश्य ही मिलंगे , क्योंकि इनके बिना गान-क्रिया चल नहीं सकती।