भारतीय शास्त्रीय संगीत की धरोहर | Indian Classical Music Theory In Hindi

भारतीय संगीत तो हमारी धरोहर है ही, लेकिन एक संगीतकार की धरोहर है संगीत शास्त्र, स्वर विज्ञान और संगीत का प्रदर्शन। इन सबका महत्त्व जाने बिना संगीत के श्रेत्र में उन्नती करना कठिन है। इनमे से किसी एक का अभाव होने पर संगीत जीवन में एक अधूरापण बना रहता है जो संगीतकार को जीवन पर्यंत कचोटता रहता है, भले ही वह किसी भी ऊँचाई पर क्यों ना पहुँच जाए।

पुस्तकालय और संगीत 

संगीतकार के लिए पुस्तकालय रखना नितांत आवश्यक है। अध्ययन करते समय वह अपना दृष्टिकोण संकीर्ण न बनाए। प्रत्येक पुस्तक का, चाहे वह भारतीय लेखक की हो अथवा विदेशी लेखक की, मनन अवश्य करना चाहिए। इस तथ्य को हमेशा याद रखें की प्रत्येक भाषा में अच्छे लेखक हुए है। अतः अपने दृष्टीकोण को उदार बनाते हुए आप जो अध्ययन करेंगे, उससे आपका ज्ञान सर्वतोन्मुखी होगा। आपके सगीत की पृष्ठभूमी उदार और गंभीर बनेगी।

यदि आर्थिक स्थिति आपको पुर्तक खरीदने की अनुमति नहीं देती तो किसी सार्वजनिक पुस्तकालय में जाकर अपनी इच्छित पुस्तकों की खोज करिए और उनका अध्ययन कीजिए। जो व्यक्ति सफल संगीतज्ञ बनाने का दृढ़ संकल्प कर लेगा, उसे आर्थिक बाधाएं कभी नहीं रोक सकेंगी। उसके जीवन में एक दिन ऐसा अवश्य आएगा, जब की सफलता उसके चरण चूमेगी।

संगीत का आदर्श है ज्ञान के सुनहरे रत्नों को एकत्रित करके जाज्वल्यमान प्रासाद का निर्माण करना तथा सार्वभौमिक मानव जीवन का एक्यव् संगठन। संगीतज्ञ को ऎसी सांगीतिक रचना का सृजन करना चाहिए जो प्रान्त व् देश की सीमाओं की विभिन्नता में रहते हुए भी एक अव्यक्त सूत्र में मानव हित तथा सहयोग के बिखरे हुए पल्लवों का वन्दंकार कलामंदिर के चारों और बाँध सकने योग्य हो। इस आदर्श की पूर्ती तभी हो सकती है जब की आप अपने शास्त्रीय (थ्योरेटिकल) ज्ञान की अभिवृद्धी करेंगे।

जीवन में संगीत का महत्त्वपूर्ण स्थान है, अतः आपको अपना सांगीतिक ज्ञान अधिक से अधिक मात्रा में बढ़ाना चाहिए और यह कभी नहीं भूलना चाहिए की आपको विश्व में भारत की सांस्कृतिक धरोहर का प्रतिनिधित्व करना है। आजकल अन्य राष्टों के सांस्कृतिक मंडल भारत में नियमित रूप से आते रहते हैं और अपने देश के दूसरे राष्टों में जाते हैं। इन शिष्ट मंडलों का ध्येय तभी पूरा हो सकता है, जबकी इनके सदस्यगण उच्च कोटि के विद्वान कलाकार हों और वे अपनी प्रतिभा से अन्य राष्ट्रीय नेताओं और जनसमुदायों को प्रभावित कर सकें। सांस्कृतिक आदान प्रदान से ही एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र से प्रगाढ़ मैत्री स्थापित करता है। इसलिए जिस देश की सांस्कृतिक थाती जितनी उच्च कोटी की होगी, वह देश उतना ही दूसरे देशों को प्रभावित कर सकेगा। अपने देश के मान मर्यादा और संस्कृति की रक्षा का उत्तरदायित्व संगीतकार पर भी है। इसीलिए पुस्तकों के पठन-पाठन की आदत पर हमारे विद्वान जोर देते है।


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